
आज
मैंने
अपने अन्दर
झाँक कर देखा !
एक आदर्श मानवता को
भय से कांपते देखा
जो था बहार वैसा मैं अपने भीतर न था
ऐसा मैंने ख़ुद को ख़ुद से आंक के देखा !
मैंने पुछा अपने मैं से
बतला दो भय तुमको किसका
उसने कहा मुझे जो भय है
तेरे सिवा और हो सके है किसका
आगे उसने यूँ कुछ बोला
अपना था ,हर भेद भी खोला
उसने है मुझे जब जब पुकारा
मैंने था उसको धुतकारा
उसने मुझे पल पल समझाया
लेकिन उसे मैं समझ ना पाया
उसने कहा यह काम ग़लत है
मैंने कहा ये वीरम ग़लत है
उसने हर अन्धकार में मेरे रोशनी के थे दिए जलाए
मैं था पागल मंदबुधि प्राणी
समझ न पाया अपने मैं की वाणी
आज मुझे जब होश है आया
हर भय
दुःख
तकलीफ से मैंने पलभर में ही पार है पाया
पछतावा है मुझको अब ये
इतने दिन बाद क्यों देखा ?
इससे पहले, क्यों नही मैंने अपने अन्दर ऐसे झाँक के देखा ???
7 टिप्पणियां:
Chaliye der aaye durust aaye....dekh to liye....bahut sunder....
स्वयं की पहचान पर बहुत ख़ूबसूरत कविता लिखी है
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चाँद, बादल और शाम । गुलाबी कोंपलें
अपने भीतर झाँकने में यही तो लफडा है बाबा.....इसीलिए तो धरती पर कुछ लोग ही अपने भीतर जाते हैं......बाकि कुछ तो जा-जाकर लौट आते हैं.....अधिकाँश तो बाबा....जाते ही नहीं....कहा ना अपने भीतर जाने में बड़ा लफडा है....बाबा....!!
aapne apne mann ki bat kahi en pankitiyo ki madad se, lekin ye panktiya sirf aap ke liye nahi hai, ye to ham sab ke liye hai, ham sab khud ko dekhe to aaapki bate bahut hi sahi shabit ho rahi hai.........achhi rachna hai.......
अच्छा है!
www.andaz-e-byan.blogspot.com
एक आदर्श मानवता को
भय से कांपते देखा
achchhi aur khoobsurat rachana ke liye badhai
nice
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